अनिद्रा
या निद्रानाश (नीद न आना) से आज के समय तनाव
पूर्ण जिंदगी में लगभग 30
to 40% वयस्क (Adult) ग्रस्त हैI अनिद्रा एक ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति को नींद या तो ठीक से नहीं आती अथवा आने पर
पुनः दूर जाना व पुनः नींद का आना सम्मिलित हैI
आज इस समस्या से महानगरों में ज्यादातर लोग अनिद्रा
से प्रभावित है, व अंग्रेज़ी दवाओ को लेकर एवं उनके दिनो-2 बढ़ती मात्रा को लेकर सबकी निगाहें आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति पर हैं, कि कैसे दवाओं
से छुटकारा पाकर दुष्प्रभाव रहित आयुर्वेद उपचार से एक स्वस्थनिद्रा पा सके। अमेरिका
जैसे विकसित देश में भी अनिद्रा (Insomnia)
एक प्रमुख समास्या है। निद्रानाश एक स्वतंत्र व्याधि न होकर
कई बीमारियो में पाया जाने वाला लक्षण हैI
आयुर्वेद
में शरीर को चलाने वाले त्रिउपस्तंभ में आहार
निद्रा व ब्रह्मचर्य को माना गया है, अर्थात ये तीनो का अगर सम्यक रूप से सेवन करते है/ पालन करते हैं, तो शरीर स्वस्थ
व निरोगी रहता हैI
आहार से शारिरिक
वृद्धि होती है। ब्रह्मचर्य रखने से मन का बल बढ़ता है। एवं सम्यक निद्रा से शरीर
और मन दोनो स्वस्थ रहते हैं।
इस
प्रकार निद्रा का सेवन शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिए अति आवश्यक है।
निद्रा
को आचार्य बसुश्रुत ने "कफ” और "तम्” से
उत्पन्न होना बताया है।
"निद्रा श्लेष्म तमो भवा"
सु०
निद्रा की परिभाषा:- इसी
परिभाषा में निद्रा न आने का करण निहित हैI
“यदातु मनसि क्लांन्ते कर्मात्मनः क्लमन्विताः।
विषयेभ्यो
निवर्तन्ते तदा स्वपित्ति मानवः ।॥
च.स.-21
जब व्याक्ति
काम करते-2 मन थक जाता है, एवं इंद्रिया भी थकने के कारण अपने-2 विषयो (शब्द स्पर्शदि) को ग्रहण करना बंद
कर देती है। तब मनुष्य सोता है
कभी-2 इंद्रिया तो अपने विषयों को नहीं ग्रहण करती पर मन कार्य करता
रहता है तब स्वपन आते हैI
सुञ्चत
ने निद्रा को विष्णु की माया स्वरूप स्वरूप कहा हैI
" सर्वेद्रिय व्युपरतो
मनोडनुपरते यदा ।
विषयेश्मैमस्तदा
स्वपन नानारूपं प्रपश्यति ।। ।।
अ.स.
निद्रानाश के कारण
"एत एव च विज्ञेया
निद्रानाशस्य हेतवः।
कार्य
कालो विकारश्च प्रकृतिर्वायुरेव च।।
च-सू० 21
1) कार्य:- कार्य की अधिकता या देर रात तक काम करना
या अधिक परिश्रम वाला कार्य करना।
2) काल:- जिस काल में निद्रा या सोने की आदत
है, उसका अवहेलना कर दुसरे समय में सोने का प्रयास करना।
3) विकार:- विकार कई तरह की व्याधियो के ग्रस्त होने
पर भी निद्रा नाश हो जाता है।
4) प्रकृति:- वात, पित्त प्रकृति के व्यक्तियो को कम निद्रा
आती है, कफ प्रकृति वालो को ज्यादा निद्रा आती हैI
5) विकृत वायु:- वात पित्त के बढ़ने से निद्रानाश हो जाता
है।
6) ज्यादा समय से Psycho active drugs
साथ ही साथ कैफीन Nicotine, Cocaine ज्यादा मात्रा में Alcohol लेना, withdrawal from
antianxiety drugs such as benzodipone, Pain relievers Such as opioids.
7) अत्याधिक मैथुन करना
8) Use of fluoroquinolone antibiotic drugs.
9) Rest less legs Syndrome.
10) Pain Cancer.
11) Hormone shift such as decade menstruation and
during Merlo pause.
12) Life events such as – fear, stress, anxiety
emotional or mental tension.
13) Poor sleep Hygiene.
14) Mental disorder, depression, Anxiety disorder.
15) Medical condition such as – Hyper Thyroids and
rheumatoid arthritis.
16) Physical exercise – common in athletes.
Types of Insomnia:-
1) Acute Insomnia:- Is a brief episode of difficulty sleeping.
Aute Insomnia is usually Caused by a life events Such as. Stress fell change,
travel, Receiving bad news, Joy, etc. often acute Insomnia resolves without any
treatment.
2) Chronic Insomnia:- Is a long term Pattern of difficulty
sleeping. Insomnia is usually considered chronic if a Person has trouble
falling a sleep or staying a Sleep at least three nights per week for Three
months or longer.
3) Comorbid Insomnia:- Is Insomnia That occurs with another
condition Psychiatric Symptoms - Such as anxiety and depression are known to be
associated with Changer in Sleep.
4) Onset Insomnias:- Is difficulty Falling a sleep at the
beginning of the night.
5) Maintenance Insomnia:- Is
The inability to stay a sleep. People with maintenance insomnia Wakeup during
The night and have difficulty returning to sleep.
आयुर्वेद मतानुसार अनिद्रा के प्रकार:-
1) वातज अनिद्रा:- इसमें निद्रा आने में कठिनाई होती हो एक बार नीद -आने पर फिर आसानी से सो सकते है)
2) पित्तज अनिद्रा:- इसमें निद्रा बीच में ही खुल जाती हैI
Pitaj Insomnia most
often correlates with Sleep maintenance.
3) कफज़ अनिद्रा में:-कफ श्रोतो अवरोध कर देता है, जिससे प्रतिश्याय आदि कारणो से शारीरिक कष्ट होता है, और निद्रा नही आती है।
4) निद्रा का वेग धारण करने से होने वाले रोग:- अगर नींद
आ रही हो और उसको रोका जाए तो ज्रम्भा शरीर का टूटना, तंद्रा, शिरःशूल आँखों में भारीपन रोग हो जाते
हैं।
Symptoms & Insomnia:-
1) Sleepiness during The day.
2) General tiredness.
3) Imitability.
4) Problems with concentration or memory.
वय के अनुसार कितनी नीद लें।:-
Age and Condition नींद (Sleep Need)
New born's (0 - 2 Month) 12
to 18 Hours
Infants (3 - 11 Months) 14
to15 Hours
Toddlers (1 - 3 Years) 12
to 14 Hours
Pre-schoolers (3 – 5 Years) 11
to 13 Hours
School-age children (5 – 10 Years) 10
to 11 Hours
Adolescents (10 – 17 Years) 8.5
to 9.25 Hours
Adults including elderly 7
to 9 Hours
नींद कितने
घंटे ली गई यह इतना ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं जितनी की किस समय पर ली गई। जब शरीर का
ताप सबसे कम होता है उस समय "मिलेनिन” का स्ताव ज्यादा होता है उस समय ली गई
निद्रा शरीर के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
Complications of
Insomnia:-
1)
Lower Performance on the Job or at school
2)
Obesity
3)
High blood pressure
4)
Heart disease
5)
Depression or anxiety disorder
6)
High risk फॉर Accidents
चिकित्सा:- अनिद्रा में वात, पित्तशामक व कपू वृर्णक चिकित्सा करनी चाहिए।
1)
निदान परिवर्जन ।
2)
स्वच्छ व मनोनुकूलशय्या पर विश्राम
I
3)
शरीर अभ्यङ
a)
पैर के तलवो (पादाभ्यङ) पर घी से अभ्यङ
b)
शिरोऽभ्यङ, घी से
4)
शरीर संवहन
5)
शिरोधारा, शिरोवस्ति जटामांसी क्वाथ या ब्राही
तेल से
6)
योगासन
प्राणायाम - भ्रामरी
त्राटक, ॐ उच्चारण:
मनको एक विन्दु पर केंद्रित करने का अभ्यास करनाI
7)
नियमित व्यायाम व Exercise
8)
सोने के पहले गुरु आहार व ज्यादा
पेय पदार्थ न लेI
9)
चाय, काफी, तम्बाकू शराव आदि का सेवन न करें।
10)
सोने से पूर्व भेष का दूध सेवन
करे।
11)
हाथ पैर के तलवे गर्दन व शिर में
घी या तैल से अभ्यङ करे।
12)
मधुर रस का ज्यादा सेवन व कड, तिक्त कषाय, रस वाले
भोज्य व पेय का कम सेवन
पंचकर्म
चिकित्सा:-
a)
विरेचन
b)
वस्ति (अनुवासन)
c)
नस्य
d)
कर्ण पुरण
e)
घूम पान
f)
शिरोवस्ति
g)
शिरोधारा
अनिद्रा में उपयोगी कुछ औषधि योग:-
a) ब्राही वटी
b) स्वर्ण ब्राह्मी वटी
c) शार्पगंधा घन वटी
d) जरामांसी फाष्ट वा चूर्ण
e) अश्वगंधा घनवटी
f) ब्राह्मी घृत
g) सारस्वतारिष्ट्र
h) सारस्वत चूर्ण
i) स्मृति सागर रस
j) अमृता रिष्ट
k) अश्वगंधा रिष्ट
l) चट्टनवला तेल (अभ्य्दार्थ)
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