डबल मार्कर टेस्ट की बात करें, तो यह गर्भधारण की पहली तिमाही पर किया जाने वाला रक्त परीक्षण है। आमतौर पर इसे गर्भधारण के 10वें और 14वें सप्ताह के बीच किया जाता है। इसमें एनोप्लॉयडी (गुणसूत्र की असामान्य मात्रा) गर्भावस्था का पता लगाया जाता है। खास यह है कि डबल मार्कर टेस्ट नॉन-इनवेसिव स्क्रीनिंग (बिना किसी कट मार्क के किया जाने वाला परीक्षण) है। इस टेस्ट के जरिए डाउनग्रेड सिंड्रोम (ट्राइसोमी 21), एडवर्ड सिंड्रोम (ट्राइसोमी 18) और पटाउ सिंड्रोम (ट्राइसोमी 13) जैसे क्रोमोसोम (गुणसूत्र) का पता लगाया जाता है । क्रोमोसोम में किसी प्रकार की कमी होने पर भ्रूण के विकास में बाधा आ सकती है या फिर जन्म के बाद भविष्य में शिशु को किसी प्रकार की स्वास्थ्य समस्या का सामना करना पड़ सकता है। कई जीन के समावेश को क्रोमोसोम यानी गुणसूत्र बोला जाता है।
आगे लेख में हम यह जानेंगे कि किन स्थितियों में डबल मार्कर टेस्ट की आवश्यकता पड़ती है और इसे क्यों किया जाता है।
डबल मार्कर टेस्ट क्यों किया जाता है?
जिन गर्भवती महिलाओं को विशेष प्रकार के गंभीर जोखिम की श्रेणी में शामिल किया जाता है, उन्हें डबल मार्कर टेस्ट कराने की आवश्यकता होती है। उनके इन गंभीर जोखिमों को देखते हुए ही चिकित्सक उन्हें डबल मार्कर टेस्ट कराने की सलाह देते हैं। आइए, एक नजर डालते हैं उन जोखिमों पर जिनके कारण गर्भवती महिला को डबल मार्कर टेस्ट कराना जरूरी हो जाता है ।
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